उस दौर में
जब आग खो गई थी हमसे
और चकमक पत्थर भी
अपनी हथेलियों को रगड़कर
अलाव जलाया था हमने...
याद है
हम मिले थे
अस्तित्व की उन सबसे भीषण
सर्द रातों में
जब सूखी लकड़ियों की तलाश में
भटकते हम
निकल आये थे
अपने वजूद से कहीं दूर
इक दूसरे के भीतर तक...
अस्तित्व के सबसे भीषण गर्म दिन हैं
बारिश खो गई है हमसे
और समंदर भी
जानता हूँ
फिर तय है हमारा मिलना
अबकी बादल रचने के लिए..
अबकी बादल रचने के लिए..
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