वो चाँद का रहने वाला
Wednesday, January 3, 2018
Saturday, April 2, 2016
Bargad aur ishwar
धरती छुपा रही है अपने हिस्से का सूरज
रौशनी के रोज़ पैदा होते कारखानों से..
परिंदों ने उड़ान भरी है आज सुबह फिर
ज़हरीले आसमान में
कि लिखा रह जाए प्रेम का आधा अक्षर भी
कहीं अस्तित्व में..
एक आंसू बचाए हुए है आदमी का आखिरी भ्रूण
अपनी कोख में,
सिमटे हुए मृत्यु की आंख की कोर पर
और ईश्वर,
वो दूर टीले पर बांध रहा है धागा उस पुराने
बरगद के चारों ओर..
भाषा ने सूली पर टांग दिए हैं सारे कोमल शब्द
सड़क ने हटा दिए हैं वो सारे संकेतक
जिनमें लिखा था नाम नदी
और बच्चों की कहानियों के सारे खरगोश भूनकर
खा लिए गए हैं
ऐसे में कहीं छुपी सहमी कविता धड़क जाती है कभी
आखिरी उम्मीद की तरह मृत्यु के महामौन के साथ
बहुत छोटे एक पल में जीवन की आस लिए..
एक मुश्किल समय में जब जीवन लड़ रहा है एक हारा हुआ युद्ध
हर क्षण, अपने अस्तित्व के लिए
ईश्वर बाँध रहा है धागा बरगद के चारों ओर
रौशनी के रोज़ पैदा होते कारखानों से..
परिंदों ने उड़ान भरी है आज सुबह फिर
ज़हरीले आसमान में
कि लिखा रह जाए प्रेम का आधा अक्षर भी
कहीं अस्तित्व में..
एक आंसू बचाए हुए है आदमी का आखिरी भ्रूण
अपनी कोख में,
सिमटे हुए मृत्यु की आंख की कोर पर
और ईश्वर,
वो दूर टीले पर बांध रहा है धागा उस पुराने
बरगद के चारों ओर..
भाषा ने सूली पर टांग दिए हैं सारे कोमल शब्द
सड़क ने हटा दिए हैं वो सारे संकेतक
जिनमें लिखा था नाम नदी
और बच्चों की कहानियों के सारे खरगोश भूनकर
खा लिए गए हैं
ऐसे में कहीं छुपी सहमी कविता धड़क जाती है कभी
आखिरी उम्मीद की तरह मृत्यु के महामौन के साथ
बहुत छोटे एक पल में जीवन की आस लिए..
एक मुश्किल समय में जब जीवन लड़ रहा है एक हारा हुआ युद्ध
हर क्षण, अपने अस्तित्व के लिए
ईश्वर बाँध रहा है धागा बरगद के चारों ओर
Sunday, January 18, 2015
किताबें शब्दशः झूठ हैं
वो मेरा आखिरी जिस्म था
और शायद तुम्हारा भी
दिन और रात की धुंध से बाहर निकल
जब छुआ था हमारी हथेलियों ने इक दुसरे को
जाने किस नक्षत्र से गिरी बूँद ने मिटा दी थी लकीरे
जिनमे इक खाली सा मैं था
इक पूरी सी तुम
किताबें शब्दशः झूठ हैं
किसी ईश्वर ने नहीं रची सृष्टी
हमने रचीं
जब हमारी उम्र भर की साँसे
उस एक पल में
पूरी की पूरी रीत कर
महाप्रलय के शोर के साथ
उखड गयीं थीं.........
Saturday, January 17, 2015
उसे लौट आने दो
'उसे लौट आने दो
तमाम किताबों को दफनाकर
अपनी कब्र में वापस....'
मुझे वो सारी कब्रें खोदकर
जगाना है अपने बुजुर्गों को...
खपरैलों वाले उस कच्चे मकान के पीछे
मिट्टी का जो इक चूल्हा है
उसी की आग को साक्षी रख
पवित्र रीतियों से
कुछ अक्षर टांक दिए थे उन्होंने
मेरे बदन पर
मुझे उन सारी लिपियों, सारे संकेतों के पार जाना था
अब बरसों बीते उन अमराइयों को पार किये भी
अक्षर शब्द हुए, शब्द किताबें...
मुझे जगाना है उन्हें
वापस अपने खाली जिस्म तक लौट आने के लिए...
'उसे लौट आने दो
उसी आँगन उसी चूल्हे में
अपना वजूद बुझा लेने दो...
उसे लौट आने दो
तमाम किताबों को दफनाकर
अपनी कब्र में वापस
उसे लौट आने दो...'
बारिश और बादल
उस दौर में
जब आग खो गई थी हमसे
और चकमक पत्थर भी
अपनी हथेलियों को रगड़कर
अलाव जलाया था हमने...
याद है
हम मिले थे
अस्तित्व की उन सबसे भीषण
सर्द रातों में
जब सूखी लकड़ियों की तलाश में
भटकते हम
निकल आये थे
अपने वजूद से कहीं दूर
इक दूसरे के भीतर तक...
अस्तित्व के सबसे भीषण गर्म दिन हैं
बारिश खो गई है हमसे
और समंदर भी
जानता हूँ
फिर तय है हमारा मिलना
अबकी बादल रचने के लिए..
अबकी बादल रचने के लिए..
वो चाँद का रहने वाला
चिताओं के लिए
लकड़ियाँ बटोरते हुए
मैंने सुने हैं उसके गीत...
सभ्यताओं द्वारा निषिद्ध
उस काली ज़िल्द वाली किताब
के अंदर
देवताओं द्वारा श्रापित
जो घना जंगल है,
हर शाम
सबसे छुपकर
वहाँ उतर आता है
वो चाँद का रहने वाला...
तुम्हे यकीन तो नही होगा
लेकिन मैंने
सलीब पर टंगे
अपने कितने ही मुर्दा जिस्मों में
हरकत होते देखी है उस वक़्त...
नीम का पेड़
लोग जब
वीरानियां लिए जिस्मों से लौटते हैं
वीरानियां लिए जिस्मों से लौटते हैं
और किताबों में प्रेम ढूंढते हैं..
वो
जाने किन पगडंडियों से गुज़रकर
वहां हरे जंगल बो देता है...
सुना है
जब सबने अपनी आँखों में
ऊँची इमारतों
और जगमगाते बाजारों वाले
शहर बसा लिए थे..
उसने अपने भीतर
इक नीम का पेड़ बचा रखा था...
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