वो मेरा आखिरी जिस्म था
और शायद तुम्हारा भी
दिन और रात की धुंध से बाहर निकल
जब छुआ था हमारी हथेलियों ने इक दुसरे को
जाने किस नक्षत्र से गिरी बूँद ने मिटा दी थी लकीरे
जिनमे इक खाली सा मैं था
इक पूरी सी तुम
किताबें शब्दशः झूठ हैं
किसी ईश्वर ने नहीं रची सृष्टी
हमने रचीं
जब हमारी उम्र भर की साँसे
उस एक पल में
पूरी की पूरी रीत कर
महाप्रलय के शोर के साथ
उखड गयीं थीं.........