Tuesday, April 1, 2014

साँसों के नक्श

यूँ सदियों की इक बेचैन तलाश खत्म हुई
यूँ इक युग का होना सम्पूर्ण..

मेरी साँसों से गुज़रते हुए
तुम्हारी साँसों  ने जो नक्श छोड़ दिए
जाने कितनी चिताओं  से होकर
वो ले आये मुझे
तमाम तरह की मृत्युओं के पार
तुम्हारे भीतर...

फिर कुछ भी तो शेष नहीं रहा
न शब्द न सभ्यताएं
न उनकी बदरंग पोशाकें
बस युगों की गर्द धो
वेद ऋचाओं से
नहाकर निकली
बेदाग़ बेलिबास ख़ामोशी
आँखों में जाने कितने बादल लिए तुम
साँसों में जाने कितने बंजर लिए मैं

और फिर  यूँ हुआ कि
बेसाख्ता लिपटकर तुमसे
बारिश ओढ़ ली मैंने
और तुम मुझमे
जंगल की तरह हरी होकर फैलती चली
गई....