Wednesday, November 21, 2012

कहो

कुछ भी नहीं कहा 
अलविदा भी नहीं 
यूँ अपने होने के निशां तक 
ले गयी 
जैसी कभी थी ही नहीं 

और ये कमबख्त ज़िन्दगी भी
इक ऐसे कगार पर आ खड़ी है 
की बस गिरी गिरी  जाती है 
बस मिटी मिटी जाती है 

कहो 
अब ज़िन्दगी को संभालूं 
या तुम्हारी यादों को  

Monday, November 19, 2012

नुमाईश

बाज़ार में नुमाईश पर लग गया होता
जो तू न पिलाता--- बहक गया होता

बस दिखावे हैं इन राहों में ज़िन्दगी कहाँ
दिल होता कहीं अगर धड़क गया होता

अपने होने के निशां तक ले गया मुझसे
मेरे होने के निशां तो रख गया होता

मेरा रस्ता लौट आया मोड़ से वापस
और जाता भी  तो कहाँ तक गया होता

Sunday, November 18, 2012

लिखना तुम्हे

अक्सर
लिखना चाहा तुम्हे.... 
अक्सर लिखा.... 
जाने क्या क्या
इतना कुछ 
की पूरी कायनात ही 
उतर आई शब्दों में 
जैसे 

तुम एहसास ही रही 

बस इक तुम्हे छु नहीं पाया 
बस इक तुम्हे लिख नहीं पाया 

Tuesday, November 13, 2012

बच्चों की किताबें

ये भी देखिये बीज और पानी क्या है
बच्चों की किताबों में कहानी क्या है

जो समझाएं हैं तुमने तमाम नस्लों को
उन लफ़्ज़ों के दरअसल मानी क्या हैं

तो कोई सड़क घर की तरफ नहीं जाती
तो ज़िन्दगी की और कहानी क्या है

वो कि जिसने बाप की कमीज़ पहन रखी है
हाँ , उसी से पूछो,  जवानी क्या है

इक जो नीम का पेड़ है तुम्हारी आंखों में
और फिर हमारे दरमियानी क्या है