Saturday, April 2, 2016

Bargad aur ishwar

धरती छुपा रही है अपने हिस्से का सूरज
रौशनी के रोज़ पैदा होते कारखानों से..
परिंदों ने उड़ान भरी है आज सुबह फिर
ज़हरीले आसमान में
कि लिखा रह जाए प्रेम का आधा अक्षर भी
कहीं अस्तित्व में..
एक आंसू बचाए हुए है आदमी का आखिरी भ्रूण
अपनी कोख में,
सिमटे हुए मृत्यु की आंख की कोर पर
और ईश्वर,
वो दूर टीले पर बांध रहा है धागा उस पुराने
बरगद के चारों ओर..

भाषा ने सूली पर टांग दिए हैं सारे कोमल शब्द
सड़क ने हटा दिए हैं वो सारे संकेतक
जिनमें लिखा था नाम नदी
और बच्चों की कहानियों के सारे खरगोश भूनकर
खा लिए गए हैं
ऐसे में कहीं छुपी सहमी कविता धड़क जाती है कभी
आखिरी उम्मीद की तरह मृत्यु के महामौन के साथ
बहुत छोटे एक पल में जीवन की आस लिए..

एक मुश्किल समय में जब जीवन लड़ रहा है एक हारा हुआ युद्ध
हर क्षण, अपने अस्तित्व के लिए
ईश्वर बाँध रहा है धागा बरगद के चारों ओर