Wednesday, January 23, 2013

मेरे चाँद पास आ...

तोड़ दे कुदरत के बंधन मेरे चाँद पास आ
आ मेरे दिलबर तू अमावस की रात आ

खिड़की के पर्दे खोल, हवाओं के साथ आ
साँसे दरमियाँ न रहें, साँसों पार आ

कि आ कभी सांझ के दो पल ही मुझे दे दे
मैं दिन की तरह आऊं तू बनके रात आ

दरमियां हैं रिश्तों के फासले बहुत, तू
नींद की ऊँगली पकड़ ख़्वाबों की राह आ

दूर तक हम दोनों खामोश ही चलते रहें
दिलों में हो जाने दें कोई प्यारी बात आ

फिर चल पड़ेंगे वादी-ए-सहरा में हम ज़िन्दगी
कर ले हम से आखिरी इक मुलाक़ात आ




Sunday, January 20, 2013

वो अनकहा...

याद है एक दिन
अपने कमरे की खिड़की के
टूटे शीशे से
बाहर ढलती हुयी शाम को
देखते हुए
मेरी आँखों ने
खामोशी से
बेतरतीब से लफ़्ज़ों में
इक उदास सा गीत गुनगुनाया था .....

दूर उस पहाड़ी पर
झील के किनारे बैठे हुए
जाने कैसे सुन लिया था तुमने....
डूबते सूरज को देखते हुए कहा
'तो तुम भी शाम को वैसे ही देखते हो जैसे मैं'
मैंने हैरानी से तुम्हारी तरफ देखा था
तुम मुस्कुराकर बोली
'जाने संवेदना का कौन सा तार जोड़ता है
तुम्हे मुझसे...तुम्हारा अनकहा
भी पहुच जाता है मुझ तक '
सच...
तुम्हारा अनकहा भी तो सुन रहा था मैं ...

अब इतना कुछ कहता हूँ मैं
क्या सुन पाती हो तुम ..

मुझ तक तुम्हारी कोई आवाज़ क्यूँ नहीं आती

Saturday, January 12, 2013

एहसासों का जिस्म

मुझे मालूम था..
कितनी आगे निकल चुकी हो तुम
तुम्हे दर्द है.....
कहीं पीछे ठहर गया था मैं....

उम्र, रिश्ते, ख़ामोशी
कितना कुछ था दरमिया हम दोनों के

एहसासों के जिस्म पर लेकिन
गर साँसों के लम्स टटोलो
तुम...बस तुम जानती हो ..
हकीक़त से ख्वाबों तक...
हदों से....
कितनी हदों से गुज़र गया था मैं ....

मेरे कमरे में
ख्वाबों का इक शहर था
अर्सा हुआ
घर की तलाश में
इक दिन वहां
फूटपाथ पे मर गया था मैं
 

तुम्हे दर्द है.....
कहीं पीछे ठहर गया था मैं ....

-adi...

Friday, January 4, 2013

यकीन मानिये

मुतमईन होके मैं खुद को जहाँ छुपा आया
शहर में सबसे पहले...वहीँ जलजला आया

कैसे तोड़ा तुमने....मुझसे टूटता ही नहीं
वो तार जो तुमसे मुझ तक जुड़ा आया

डरो नहीं अब दुकानें खोल लो अपनी
मैं बुद्ध को भी.......मंदिर में बिठा आया

सड़क पर उन्ही नाजायज़ खयालों की वहशत है
जो तू अंधेरों में अपनी कोख से गिरा आया

यकीन मानिए....मैंने कुछ ख़रीदा ही नहीं
बाज़ार खुद बिक के मेरे साथ घर चला आया