वो अनकहा...
याद है एक दिन
अपने कमरे की खिड़की के
टूटे शीशे से
बाहर ढलती हुयी शाम को
देखते हुए
मेरी आँखों ने
खामोशी से
बेतरतीब से लफ़्ज़ों में
इक उदास सा गीत गुनगुनाया था .....
दूर उस पहाड़ी पर
झील के किनारे बैठे हुए
जाने कैसे सुन लिया था तुमने....
डूबते सूरज को देखते हुए कहा
'तो तुम भी शाम को वैसे ही देखते हो जैसे मैं'
मैंने हैरानी से तुम्हारी तरफ देखा था
तुम मुस्कुराकर बोली
'जाने संवेदना का कौन सा तार जोड़ता है
तुम्हे मुझसे...तुम्हारा अनकहा
भी पहुच जाता है मुझ तक '
सच...
तुम्हारा अनकहा भी तो सुन रहा था मैं ...
अब इतना कुछ कहता हूँ मैं
क्या सुन पाती हो तुम ..
मुझ तक तुम्हारी कोई आवाज़ क्यूँ नहीं आती
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