मुतमईन होके मैं खुद को जहाँ छुपा आया
शहर में सबसे पहले...वहीँ जलजला आया
कैसे तोड़ा तुमने....मुझसे टूटता ही नहीं
वो तार जो तुमसे मुझ तक जुड़ा आया
डरो नहीं अब दुकानें खोल लो अपनी
मैं बुद्ध को भी.......मंदिर में बिठा आया
सड़क पर उन्ही नाजायज़ खयालों की वहशत है
जो तू अंधेरों में अपनी कोख से गिरा आया
यकीन मानिए....मैंने कुछ ख़रीदा ही नहीं
बाज़ार खुद बिक के मेरे साथ घर चला आया
शहर में सबसे पहले...वहीँ जलजला आया
कैसे तोड़ा तुमने....मुझसे टूटता ही नहीं
वो तार जो तुमसे मुझ तक जुड़ा आया
डरो नहीं अब दुकानें खोल लो अपनी
मैं बुद्ध को भी.......मंदिर में बिठा आया
सड़क पर उन्ही नाजायज़ खयालों की वहशत है
जो तू अंधेरों में अपनी कोख से गिरा आया
यकीन मानिए....मैंने कुछ ख़रीदा ही नहीं
बाज़ार खुद बिक के मेरे साथ घर चला आया
लाजवाब............
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