सबको मुख्तलिफ स्कूलों की वर्दियां पहनाई गई
इक कबीर था , सो उससे पोथियाँ लिखवाई गई
हमारी आँखों की कमज़ोरी का इल्म है उनको
इक कबीर था , सो उससे पोथियाँ लिखवाई गई
हमारी आँखों की कमज़ोरी का इल्म है उनको
नई नई ऐनकों से तवारीख पढवाई गई
खून आखिर खून था ......रंग बदलता कैसे
थक कर चोटियाँ और दाढ़ियाँ बढ़वाई गई
जाने क्यूँ किसी की आँख में आंसू नहीं आये
अबके भी तो 'हीर' उसी शिद्दत से सुनाई गई
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