Wednesday, January 23, 2013

मेरे चाँद पास आ...

तोड़ दे कुदरत के बंधन मेरे चाँद पास आ
आ मेरे दिलबर तू अमावस की रात आ

खिड़की के पर्दे खोल, हवाओं के साथ आ
साँसे दरमियाँ न रहें, साँसों पार आ

कि आ कभी सांझ के दो पल ही मुझे दे दे
मैं दिन की तरह आऊं तू बनके रात आ

दरमियां हैं रिश्तों के फासले बहुत, तू
नींद की ऊँगली पकड़ ख़्वाबों की राह आ

दूर तक हम दोनों खामोश ही चलते रहें
दिलों में हो जाने दें कोई प्यारी बात आ

फिर चल पड़ेंगे वादी-ए-सहरा में हम ज़िन्दगी
कर ले हम से आखिरी इक मुलाक़ात आ




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