आ मेरे दिलबर तू अमावस की रात आ
खिड़की के पर्दे खोल, हवाओं के साथ आ
साँसे दरमियाँ न रहें, साँसों पार आ
कि आ कभी सांझ के दो पल ही मुझे दे दे
मैं दिन की तरह आऊं तू बनके रात आ
दरमियां हैं रिश्तों के फासले बहुत, तू
नींद की ऊँगली पकड़ ख़्वाबों की राह आ
दरमियां हैं रिश्तों के फासले बहुत, तू
नींद की ऊँगली पकड़ ख़्वाबों की राह आ
दूर तक हम दोनों खामोश ही चलते रहें
दिलों में हो जाने दें कोई प्यारी बात आ
फिर चल पड़ेंगे वादी-ए-सहरा में हम ज़िन्दगी
कर ले हम से आखिरी इक मुलाक़ात आ
फिर चल पड़ेंगे वादी-ए-सहरा में हम ज़िन्दगी
कर ले हम से आखिरी इक मुलाक़ात आ
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