Saturday, January 17, 2015

सर पर रात

रात सर पर थी और रात के सर पर सात आसमानों के
अँधेरे का बोझ
मैंने सुना, उसने भीतर से खिड़की पर दस्तक दी

कभी देखा है अपनी आवाज़ का पीछा करके
उस आखिरी सिरे तक जहाँ वो दम तोडती है और
फिर उसका मुर्दा सन्नाटा लौटता है वापस
और दफ्न कर देता है तुम्हारा एक तुम तुम्हारे ही भीतर

मैंने रात के सर से अँधेरा उतारकर
उसी में दफ्न कर दिया सारा सन्नाटा अपनी आवाजों का
वहीँ आखिरी सिरे पर...
लौटा तो दस्तक खड़ी थी खिड़की पर
और भीतर बिस्तर पर बिखरे थे
कितने ही ज़िंदा चेहरे उसके और मेरे

रात सर पर है
और सातों आसमान पर अँधेरे का बोझ   
उसने कहा है वो उस आखिरी सिरे से मुझको लेकर लौटेगी....


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