Saturday, January 12, 2013

एहसासों का जिस्म

मुझे मालूम था..
कितनी आगे निकल चुकी हो तुम
तुम्हे दर्द है.....
कहीं पीछे ठहर गया था मैं....

उम्र, रिश्ते, ख़ामोशी
कितना कुछ था दरमिया हम दोनों के

एहसासों के जिस्म पर लेकिन
गर साँसों के लम्स टटोलो
तुम...बस तुम जानती हो ..
हकीक़त से ख्वाबों तक...
हदों से....
कितनी हदों से गुज़र गया था मैं ....

मेरे कमरे में
ख्वाबों का इक शहर था
अर्सा हुआ
घर की तलाश में
इक दिन वहां
फूटपाथ पे मर गया था मैं
 

तुम्हे दर्द है.....
कहीं पीछे ठहर गया था मैं ....

-adi...

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