रात गए शहर में कोई हादसा नहीं हुआ
ज़रा देखिये, खुदा कहीं मर तो नही गया
अब गाँव के चौराहे धुप से जलते होंगे
सुना है वो बुढा बरगद नहीं रहा
जज्बातों की ज़मीन से पता चलता है
कितनी सदियों से ये दरिया नहीं बहा
बुजुर्गों से जो मिले थे खोटे थे शायद
बाज़ार में ईमान का कोई सिक्का नहीं चला
और बस हलकी सी रौशनी आई थी भोर की
दिन का बाकी हिस्सा मुझको अब तक नहीं मिला
thoughtful
ReplyDeletethanks shreya..-)))
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